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'Untouchability Mukt Bharat' Resolution 1 at VHP Udipi Dharma Sansad


उडुपी, 25 नवम्बर। धर्म संसद के आज के अधिवेशन की अध्यक्षता मुम्बई के पूज्य स्वामी विश्वेश्वरानंद जी महाराज ने की। इस सत्र में विश्व हिन्दू परिषद के कार्याध्यक्ष डाॅ. प्रवीण भाई तोगडिया ने विश्व हिन्दू परिषद का निवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि अस्पृृश्यता शास्त्रसम्मत नहीं है। वेदों सहित किसी भी धर्मशास्त्र में अस्पृृश्यता की मान्यता नहीं है। विश्व हिन्दू परिषद भारत से अस्पृृश्यता के उन्मूलन के लिए कटिबद्ध है। उडुपी में 1969 से प्रारंभ हुआ यह अभियान अपना प्रभाव दिखा रहा है। राम जन्मभूमि का शिलान्यास एक दलित कार्यकर्ता कामेश्वर चैपाल द्वारा करवाकर व डोम राजा के घर पर संतों का भोजन कराकर विश्व हिन्दू परिषद ने अपने संकल्प को आगे बढ़ाया है। अब ‘‘हिंदू मित्र परिवार योजना’’ के द्वारा लाखों हिंदू दलित बन्धुओं के साथ पारिवारिक सौहार्द निर्माण कर रहे हैं। ‘‘एक मंदिर, एक कुंआ, एक श्मशान-तभी बनेगा भारत महान््’’ का मंत्र सारे भारत में घूम रहा है। अमरावती महाराष्ट्र से पधारे पूज्य जितेन्द्रनाथ जी महाराज ने अस्पृृश्यता उन्मूलन का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि समरसता के लिए यह समय सबसे अधिक उपयुक्त है। समरसता का मंत्र साकार होते हुए दिखाई दे रहा है। महामहिम राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री समरसता के जीवंत उदाहरण हैं। वेदों व शास्त्रों के अध्ययन का अधिकार सबको मिलना चाहिए। भारत के सभी संत मिलकर अस्पृृश्यता का कलंक मिटाने का संकल्प लेते हैं। यह समाप्त होगी ही और समरस भारत एक महाशक्ति के रूप में प्रकट होगा। जब हमारे इष्ट देवों की कोई जाति नहीं तो भक्तों की कैसे हो सकती है?
रेवासा पीठाधीश्वर पूज्य राघवाचार्य जी महाराज ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन करते हुए कहा कि मुस्लिम और अंग्रेजों के शासन ने ही इस भेदभाव का निर्माण किया और इसको मजबूती दी। गुलामी की देन इस कुप्रथा का उन्मूलन करके ही भारत को मजबूती दी जा सकती है। बौद्ध संत भन्ते राहुलबोधि जी ने भी इस प्रस्ताव का अनुमोदन करते हुए कहा कि डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर ने अस्पृृश्यता उन्मूलन के लिए जीवनभर प्रयास किया। सफल न होने पर ही उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। भारत की सभी आध्यात्मिक परंपराओं के संतों के इस संकल्प के कारण डाॅ0 अम्बेडकर का सपना अवश्य साकार होगा। पूज्य हरिशंकर दास जी, राजस्थान ने कहा कि छुआछूत हमारे समाज की विकृृति है जो अवश्य दूर होगी। पूज्य रमेशदास जी महाराज, पंजाब, फूलडोलबिहारी दास जी महाराज, वृृन्दावन, सुखवेन्द्र तीर्थ जी महाराज, उडुपी ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। श्रीमहंत लिंगाशिवाचार्य जी महाराज बेंगलोर ने उद््घोष करते हुए कहा कि वीर, शैव सम्प्रदाय अलग नहीं है। यह हिंदू समाज का ही अंगभूत है। इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। गोविन्द देव गिरि जी महाराज ने प्रस्ताव पारित करवाते समय कहा कि जब एक भगवान ने ही चराचर जगत का निर्माण किया है तो उनमें भेदभाव कैसे हो सकता है ? भक्ति भाव ही सबको एक साथ बांध सकता है। संतों के संकल्प से समरसता का सपना अवश्य साकार होगा।

पूज्य गंगाधरेन्द्र सरस्वती जी महाराज कर्नाटक ने मंदिरों का अधिग्रहण व मंदिरों के ध्वंस के विरोध में प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि मंदिरों की व्यवस्था सरकार के नहीं, समाज के हाथों में होनी चाहिए। कर्नाटक में भी कानून बनाकर मंदिरों के स्वामित्व को हड़पने का षड़यंत्र किया गया था। इसका प्रबल विरोध हिंदू समाज के संतों ने किया। संतों के आग्रह पर मंदिरों की देखभाल के लिए एक स्वायत्त बोर्ड बनाया गया परन्तु बाद में इस बोर्ड को भंग करके एक नया कानून बनाया गया जिसे न्यायपालिका ने निरस्त कर दिया। इसके बावजूद कर्नाटक सरकार मंदिरों पर कब्जे का हर तरीके से प्रयास कर रही है। चुनाव नजदीक होने के कारण इसे अभी रोका गया है। परन्तु राज्य सरकार के इरादे अब भी अपवित्र हैं। पूज्य संग्राम जी महाराज, तेलंगाना ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि सरकारों का काम मंदिर चलाना नहीं है। हरियाणा से पधारे योगीराज दिव्यानंद जी महाराज ने हरियाणा में अधिग्रहण किए गए मंदिरों पर राज्य सरकारों को चेतावनी देते हुए कहा कि यह आदेश अविलम्ब वापिस लेना चाहिए। इन मंदिरों का समाजिकरण चाहिए सरकारीकरण नहीं। केरल से पूज्य अयप्पादास जी महाराज ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि पार्थसारथी मंदिर पर जिस तरह सरकार ने कब्जा किया है वह घोर निंदनीय है। कर्नाटक से भी कालहस्तेन्द्रनाथ जी महाराज ने इस प्रस्ताव के समर्थन में बोलते हुए सभी राज्य सरकारों को चेतावनी दी कि वे हिंदू समाज को ही मंदिर चलाने दें, यह सरकारों का काम नहीं है। न्यायपालिका के आदेश की आड़ में तोड़े गए हिंदू मंदिर इन सरकारों की दूषित मानसिकता को दर्शाते हैं। पूज्य रामशरणदास जी महाराज, हिमाचल, पूज्य साध्वी प्रज्ञा भारती, भोपाल, श्रीमहंत प्रेमदास जी महाराज, राजस्थान, पूज्य गुरुपदानन्द जी महाराज, बंगाल ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। धर्मसंसद में उपस्थित सभी संतों ने \ ध्वनि से सर्वसम्मति के साथ इस प्रस्ताव को पारित किया। 

Udupi, 25th November.

The VHP Dharma_Sansad was presided by his Holiness Swamy Vishweswar swamy Maharaj ji of Mumbai. In this session, the working President of VHP, Praveen bhai Togadia proposed a resolution on Untouchability which is not in our scriptures. Even in Vedas or in any Dharma Sastras untouchability did not have any place. VHP is bent on eradicating untouchability completely from India. This campaign which started in Udupi in the year 1969, seems to show its impact. Setting as an example, Saints were fed at the house of Dom Raja Community organized by VHP through a Shilanyas karyakartha Kameshwar Choupal. 

In order to take forward this campaign, VHP, organized the foundation of Ram janma Bhoomi, by a Dalit worker, Kameswar Choupal and food in the house of Dome Raja for the saints. Now, through “Hindu Mitra Parivar Yojana”, lakhs of Hindu Dalit brethren are into this fold cultivating intimacy amongst each other. “Ek mandir, ek kuva, ek smashan “which means one temple, one well, one cremation ground- only will make Bharat great”, is the only mantra that is doing the rounds in Bharat. His Holiness, Puya Jitendranath ji Maharaj, who came from Amaravathi in Maharashtra, said that this was the right time for bringing harmony among all. The mantra of harmony, i.e understood Samarasata seems to be materializing. His Excellency, the Prime Minister is the live example of Samarasata. The right to study Vedas and Sastras should be given to all. All the great saints of Bharat are equivocal in eradicating the idea of untouchability. This will get eradicated and Bharat will become a super power in this whole idea of spreading equality. When the divine avatars, whom we all love, don’t belong to any particular cast, then why this disparity among devotees?

Revasa pontiff, Pujya Raghavacharya Maharaj has alleged that the rule of the British and Muslims contributed in strengthening this disparity. Bharat can become strong only by eradicating this bad system of untouchability. Boudh Savth, Bhante Rahul Bodhi ji, also endorsed this statement and said that Dr.Bheem Rao Ambedkar dedicated his life for the cause of eradicating untouchability. After he failed in this, he accepted Buddhism. The resolution to do a way with this, by all the religious heads, will definitely help in realizing the dream of Dr.Ambedkar, Pujya Harish Shankar Das ji of Rajasthan has said that this imbalance of society will surely be eradicated.

Pujya Ramesh Das ji of Punjab, Pujya Phooldol Das ji of Brindavan, Pujya Sukhwendra Das ji of Udupi have also supported this statement. Sri Lingacharya ji Maharaj of Bengaluru stressed that Vir Shaiva tradition is not different from all this. This is also a component of Hindu society. Both are inseparable. Sri Govind Dev Giri ji Maharaj has questioned that how can there be differences when the creator of this whole creation is the same. The common thread to tie everyone is only bhakti or devotion. The solemn vow taken by these saints will definitely materialize.

Pujya Gangadharendra Saraswathi ji Maharaj of Karnataka, has opposed the idea of acquisitions of temples and their demolition. The systems regarding temples should be in the hands of the society and not the Government. In Karnataka some temples were usurped in the name of law. This was very strongly opposed by the Hindu saints. Seeing the displeasure of these saints an autonomous board was setup to look after the temples but later the board was dissolved and another new law was enforced but declared void by the judiciary. In spite of this also, Karnataka Government is not leaving any stone unturned in occupying these temples. As the elections are very soon coming, these acquisitions have slowed down. The intentions of the state Governments are still not good. Pujya Sangram ji Maharaj of Telangana has alleged that the Government has nothing to do with the temples. Pujya Yogi Raj Divyanand ji of Haryana also reiterated the same and also warned the state Government. Pujya Appaya Das ji Maharaj from Kerala also supported this and said that the way the Parthasarathi temple was usurped by the Government was malleable. Pujya Kalahastendranath ji from Karnataka also reiterated the same and warned the state Government that only society has the right to control temples. The temples demolished by taking the protection of the law reflect the bad intentions of the Government. The others who also unanimously supported this resolution are Pujya Ramsharan Das ji of Himachal Pradesh, Sadhvi Pragnya Das ji of Bhopal, Sri Hemant Prem Das ji of Rajasthan, Sri Guru Padanand ji of West Bengal and all Saints presented in Dharma Sansad.

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